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शर्मिन्दगी (गीत)

Posted On: 1 May, 2015 Others,कविता,Others में

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लाज हिन्द लुटी मिट गये पर हम है जिन्दा

वतन पे मर मिटने वालो हम खुद पर शर्मिन्दा।। मुखड़ा।।

करे निचाई नीच वो बीच गैल दरम्यान

मर्यादा खण्डित हुई शक्ति का अपमान।

द्रोपदी हमसे चीर माँगती हम नहीं गोविन्दा।।1।।

बकर बकर बक बक करी बदला लेगा कौन

क्षत विक्षत शव हो गए पर अपना मन मौन

लघु खग पागल घायल करता निश्तेज परिन्दा।।2।।

करुण शब्द नम नयन मुख श्रद्धा सुमन अनेक

करुण शब्द वर्जित यहाँ हो प्रहार बस एक

समय परे पर चूक गये अब होती जग निन्दा।।3।।

अधिकारी अधिकार बिन स्वाभिमान से हीन

कष्ट है भ्रष्ट मशीनरी गिने एक दो तीन।

सोचनीय हालत अपनी ओ ‘महारथी’ गन्दा।।4।।

डा. अवधेश किशोर शर्मा ‘महारथी

वृन्दावन, मथुरा (उ.प्र.)

+919319261067



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