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अमर प्रेम की बेल (गीत)

Posted On: 3 May, 2015 Others,कविता,Others में

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अमुआ की डारी पै

बोले रे कोयलिया

कागा ना आवे

मेरे अंगना ओ बहना

चैन ना पड़ै रे

मोहे दिन और रैना।।मुखड़ा।।

पीहू पीहू पपिहा

बोले रे मोबाइला

पीयू परदेश

पुकारे मेरी मैना

दुसह विरह

मुश्किल पर सहना।।1।।

सरप जहर बुझी

चले पुरवैया

चमके बिजुरिया

पै बीजुरी परैना

का कहूं कैसे

बोलूं जाय कहैना।।2।।

देह जरै परैं

सीरी सीरी बुदिंया

बिरहा की आग

बुझाऐं तें बुझैना

सावन बरखा कौ

घाव भरैना।।3।।

डा. अवधेश किशोर शर्मा ‘महारथी

वृन्दावन, मथुरा (उ.प्र.)



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

meenakshi के द्वारा
May 10, 2015

सुन्दर गीत .

meenakshi के द्वारा
May 10, 2015

सुन्दर गीत .शुभकामनाएं .

Maharathi के द्वारा
May 11, 2015

मीनाक्षी जीः आपकी अमूल्य सकारात्मक प्रतिक्रिया ऊर्जा का संचार कर रही है । बहुत बहुत धन्यवाद ।

Maharathi के द्वारा
May 19, 2015

Thank you very much for your valuable comments on my hindi poem अमर प्रेम की बेल (गीत)


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