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करतब बोध (घनाक्षरी छन्द)

Posted On: 8 May, 2015 Others,कविता में

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जनम दयौ है पालौ क्षीर हू पिलायौ नित ,

दुख सह सुख दयौ जननी कौ ऋण ये ।

पालौ पाषौ नाम दयौ काबिल बनायौ आजु ,

भूखे रह भूख मेटी जनक कौ ऋण ये ।

रंग दयौ धानी धानी रूखौ सूखौ पट देखि ,

मांजि कें चमक दई गुरु कौ है ऋण ये ।

पटै ऋण धन धान्य और अहसान हू कौ ,

‘महारथी’ परि कैसे पटि पावै ऋण ये।।1।।

पोषौ तोय याके लिए तू भी पोषे और काऊ ,

माँ की ममता कूँ तू जो दाग ना लगायगौ ।

किलकारी सुनि जैसे जनक अगारी आए ,

जैसे तू बढायौ सुत तू भी जो बढायगौ।

रंग दे समाज जीय जन कल्याण हेतु ,

राह दई गुरु जो वाई पै चलि जायगौ ।

‘महारथी’ करतब बोध कूँ जगाले आजु ,

अपने ही आप ऋण सारौ चुक जायगौ।।2।।

डा. अवधेश किशोर शर्मा ‘महारथी

वृन्दावन, मथुरा (उ.प्र.)

+919319261067



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