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माँ (छन्द)

Posted On: 9 May, 2015 Others,कविता,Others में

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जब जब डरा अंधकार से

बचपन में आधी रात को ।

कर बंद आंखें छुप  गया

आँचल जगा कर मात को ।

वह बैठ कर आंचल संजोती

लाड़ करती तात को ।

सब झेल जाती दुख मगर

कहती न मुख इक बात को ।।1।।

बीमार जब जब सुत हुआ

छोड़ा न इक पल हाथ को ।

पट्टी रखी जल की कि फिर

सहला उठी थी माथ को ।

कर आंख दोनों बंद मन

में पूजती श्री नाथ को ।

कर बंद आंखें चल पड़ी

अब छोड़ कर वह साथ को ।।2।।

डा. अवधेश किशोर शर्मा ‘महारथी

वृन्दावन, मथुरा (उ.प्र.)

+919319261067



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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

DR. SHIKHA KAUSHIK के द्वारा
May 9, 2015

माँ को समर्पित अद्भुत रचना .आभार

Dr. D K Pandey के द्वारा
May 9, 2015

अच्छा लिखा माँ सिर्फ माँ है …

Madan Mohan saxena के द्वारा
May 19, 2015

सुन्दर लेखन के लिए बहुत बहुत अभिनन्दन और बधाई

Maharathi के द्वारा
May 20, 2015

डा. कौशिक जीः मुझे जितनी आवश्यकता आपके द्वारा दिये गये प्रोत्साहन की है उससे अधिक आप जैसे अग्रणी लेखिका के द्वारा समालोचना की भी। मैं लगातार आपकी टिप्पणियां प्राप्त कर रहा हूं और गद् गद् हो रहा हूं। आपकी भूरि भूरि प्रशंसा करता हूं। कृपया स्वीकार करें। धन्यवाद।

Maharathi के द्वारा
May 20, 2015

डा. डी.के. पाण्डेय जी। आपसे प्राशंसा प्राप्त हुई अभिभूत हुआ साभार धन्यवाद।

Maharathi के द्वारा
May 20, 2015

श्री मदन मोहन सक्सैना जी। आपको सुन्दर लगा तो मेरा लेखन सफल हुआ। धन्यवाद।


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