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आज का अर्जुन (कहानी)

Posted On: 13 Jun, 2015 Others,social issues,Hindi Sahitya,Others में

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आज फिर महाभारत होने की कगार पर था। आज फिर अर्जुन के सामने द्रोणाचार्य खड़े हुए थे। लेकिन आज के अर्जुन ने हार मान ली। जिस गुरु से निशाना लगाना सीखा था। आज अर्जुन उस पर निशाना लगाने का साहस नहीं कर सका। कारण स्पष्ट है कि आज कृष्ण उसके साथ नहीं है जो उसे गीता का उपदेश देते। धनुष बाण गुरुदेव के चरणों में रख कर रणभूमि से बैरंग लौट गया। यह वाकया इसी वर्ष अर्थात् जनवरी, 2015 का है।

बात यह है कि एक प्रोफेसर की पोस्ट के लिए मेरे हिसाब से मेरे पास तीनों योग्यताऐं हैं अपने विषय अर्थात् पशु विज्ञान में पीएच.डी. की डिग्री, बीस वर्ष का शोध एवं अध्यापन का अनुभव और बड़ी संख्या में प्रकाशित शोध पत्र इत्यादि। लेकिन आज के जमाने में इन योग्यताओं के अतिरिक्त एक और योग्यता होनी चाहिए। बस शब्दों से ही समझ लीजिए। समझदार के लिए इशारा काफी होता है।

मैंने कहाँ कहाँ इण्टरव्यू नहीं दिये। मेरठ (तत्कालीन कुलपति महोदय भ्रष्टाचार के कारण टरमिनेट किये जा चुके हैं), इलाहाबाद (मामला जाँच तक पहुंचा गया था लेकिन बाद में उसे दबा दिया गया), दिल्ली, पंतनगर, कानपुर (तत्कालीन कुलपति महोदय को भ्रष्टाचार के चलते विश्व विद्यालय से हटा दिया गया है), और न जाने कहाँ कहाँ मुझे उस चैथी योग्यता के न होने कारण पराजय का सामना करना पड़ा।

सहारा केवल प्राइवेट कालेज थे। वर्तमान में मैं एक प्राइवेट कालेज में एशोसिएट प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष के रूप में कार्यरत हूँ। प्राइवेट कालेज में सेवा शर्तों और वेतन आदि के बारे में मुझे कुछ भी लिखने की आवश्यकता नहीं। जरा सी समझ रखने वाले लोग भी जानते हैं कि प्राइवेट कालेजों में किस प्रकार शोषण होता है।

मैंने प्राइवेट विश्व विद्यालयों में अपना भविष्य तलाशना प्रारम्भ किया। लेकिन अधिकतर प्राइवेट विश्व विद्यालयों में कृषि की शिक्षा नहीं दी जाती है। भाग्यवश ग्वालियर के एक प्राइवेट विश्व विद्यालय में बी.एससी.(कृषि) तथा एम.एससी.(कृषि) की शिक्षा प्रारम्भ की गयी। विश्व विद्यालय से जिस पोस्ट का विज्ञापन हुआ वह एक संविदा आधारित प्रोफसर की पोस्ट थी। मैंने आवेदन दिया। विश्व विद्यालय द्वारा मुझे इण्टरव्यू के लिए बुलाया गया।

इण्टरव्यू के लिए वहाँ मेरे गुरुदेव भी आये हुए थे। उनकी आयु काफी हो चुकी थी। वे लगभग आठ साल पहले मथुरा पशु चिकित्सा विज्ञान विश्व विद्यालय से प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष पद से सेवा निवृत्त हो चुके हैं और अच्छी खासी पेंशन भी पा रहे हैं। आजकल वे कानपुर स्थित एक कृषि विश्व विद्यालय में संविदा आधारित सेवा दे रहे थे। मैंने गुरुदेव को देखा और चरणों में शीश झुकाया। उन्होंने सदा सुखी रहने का आर्शीवाद दिया। उन्होंने मेरे व मैंने उनके हालचाल पूछे। वे मेरी बहुत प्रशंसा भी कर रहे थे।

इण्टरव्यू के लिए कुलपति महोदय के केबिन से पहला बुलावा गुरुदेव के लिए आया। और वे इण्टरव्यू के लिए अन्दर जा चुके थे। मेरी बारी आने वाली थी।

मेरे मन में एक टीस उठ रही थी एक अन्तद्र्वन्द चल रहा था कि काश इण्टरव्यू के लिए गुरुदेव के स्थान पर कोई और होता। मैं मन ही मन थोड़ा विचलित हो उठा था। मुझे लगा कि क्या आज यहाँ ग्वालियर में फिर से एक और महाभारत का युद्ध होने वाला है। यदि ऐसा है तो क्या मैं अपने गुरुदेव को हरा कर विजय प्राप्त करने के लिए ग्वालियर आया हूँ। मेरा विचार था कि यह महाभारत नहीं होना चाहिए। या तो गुरुदेव को मैदान छोड़ देना चाहिए या फिर मुझे। लेकिन वे तो अन्दर रणभूमि में पदार्पण कर चुके थे। लिहाजा मैंने रणभूमि में न उतरने का निर्णय ले लिया।

उनके कुलपति महोदय की केबिन से इण्टरव्यू के बाद बाहर आने पर मेरा नाम पुकारा गया। लेकिन मैं खामोश रहा। गुरुदेव ने भी मुझ से कहा कि मैं इण्टरव्यू के लिए जाऊँ। वे शुभकामनाऐं भी दे रहे थे। लेकिन वे मेरे मन में जो उनके लिए श्रद्धाभाव के पौधे उगे हुए थे वे उन्हें न देख सके और न पढ सके। मैंने आदर भाव के साथ कह दिया कि आपके विरुद्ध मैं अन्दर जा कर इण्टरव्यू नहीं दे सकता। पता नहीं क्यों, ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वे मेरे निर्णय पर मन ही मन मुस्कुरा रहे थे।

मेरे दिल ने मुझे गुरुदेव के विरुद्ध रण करने से निर्णायक रूप से रोक दिया था। मैं अन्तिम निर्णय ले चुका था कि मुझे उन गुरुदेव के विरुद्ध तीर नहीं चलाना है जिनसे मैंने धनुर्विद्या सीखी है। मैंने अपने हथियार रख दिये। कुरुक्षेत्र की सीमा को प्रणाम किया और वापस वृन्दावन आ गया।

बाद में मुझे यह ज्ञात हुआ कि वे इस संविदा आधारित प्रोफेसर के पद के लिए इतने लालायित थे कि कुलपति महोदय से इण्टरव्यू के एक दिन पहले वे मिल भी चुके थे। इण्टरव्यू तो एक बहाना मात्र रह गया था।

गुरुदेव आज भी कानपुर स्थित विश्व विद्यालय के साथ साथ ग्वालियर में स्थित उस विश्व विद्यालय में भी संविदा आधारित प्रोफेसर पद पर सेवा प्रदान कर रहे हैं और मैं फिर उसी शोषण भरे माहौल में जीवन यापन करने के लिए विवश हो कर वापस उसी कालेज में लौट आया।

(घटना, पात्र एवं स्थान आदि सभी काल्पनिक हैं यदि कोई समानता पायी जाती है तो वह महज एक संयोग है।)

डा. अवधेश किशोर शर्मा महारथी

129, टटिया स्थान रोड, राधा निवास प्रथम,

वृन्दावन-281121, मथुरा (उ.प्र.)

+919319261067



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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
June 14, 2015

श्री अवधेश जी जिस प्रश्न को आपने उठाया है वः की लोगों की खानी है कुछ लोग सारी जिन्दगी टेम्परेरी काम करते रहते हैं ज्यादातर कालेज में नौकरिया अपने बच्चों के बीच आपस में बाँट ली जाती है तूने मेरे बच्चे को लगाया कल में तुम्हारा ध्यान रखूंगा अफ़सोस मत करिये यह तो कालेजों में होता रहता है

Maharathi के द्वारा
June 15, 2015

डा. शोभा भारद्वाज जी सादर प्रणाम। सत्य कहा है आपने कि ‘‘अफसोस मत करिये’’। अफसोस करने पर यह भी जायेगा। वैसे यह तो एक कहानी मात्र है। वास्तविकता तो इससे भी अधिक भयावह है। आज मेरे देश में “गधे पंजीरी खा रहे अश्व बंधे घुड़साल” की स्थिति है। मुझे कोई अफसोस नहीं है मैं अपना कार्य कर रहा हूँ। हो सकता है कि धृतराष्ट्रों, शकुनियों और दुर्योधनों के बीच कहीं भीष्म मजबूर हों तथा ऐसे भारत वर्ष को अर्जुन की आवश्यकता न हो। आभार सहित। महारथी।।

Neha Verma के द्वारा
June 16, 2015

उत्तम लेख महारथी जी. आपने आज की परिस्थितियों को निश्छल विचारो के साथ प्रस्तुत किया. चाहे गुरु जैसे भी हो उनका स्थान रहेगा तो हमेशा ईश्वर से ऊँचा ही.

Neha Verma के द्वारा
June 16, 2015

उत्तम लेख महारथी जी. निश्छल विचारो के साथ गुरु का आदर ही ईश्वर की सेवा के सामान हैं.प्रणाम आपको.

Neha Verma के द्वारा
June 16, 2015

अपने गुरुओ के प्रति समर्पित एक उत्तम लेख स्पष्टवादिता और गुरु शिष्य के बीच कलयुग सम्बन्धो को प्रदर्शित करता हुआ. प्रणाम आपको.

Maharathi के द्वारा
June 17, 2015

सुश्री नेहा वर्मा जी सादर नमस्कार।। आपने मेरी भावनाओं को छूआ। कहानी के पीछे छिपे भावार्थ को आत्मसात किया है। मेरे लिए इससे बड़ी और क्या बात हो सकती है। कहानी की प्रषंसा करने के लिए धन्यवाद।। महारथी।।


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