maharathi

Just another Jagranjunction Blogs weblog

74 Posts

466 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 21368 postid : 1005149

सोडली परिचय (हिन्दी काव्य सृजन की एक नई विधा)

Posted On: 11 Aug, 2015 Others,Hindi Sahitya,Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Sodali Sodaliआजकल काव्य सृजन में अनेक नये रूप रहे हैं। तुकान्त और अतुकान्त दोनों ही प्रकार की कविताओं के सृजन में कविगण बढ चढ कर हिस्सा ले रहे हैं। मैं इन में से किसी भी काव्य सृजन का विरोधी या आलोचक नहीं हूँ। इसका कारण स्पष्ट है कि आलोचना और विरोध ज्ञानियों और विद्वान जन का कार्य है, और मैं स्वयं को हिन्दी साहित्य का कोई ज्ञानी या विद्वान नहीं मानता हूँ। सविनय स्वीकार करता हूँ कि यह सब बस गुरुदेव की कृपा का चमत्कार है कि सृजन कार्य हो पा रहा है। ============================================

सोडली! आपके सम्मुख हिन्दी साहित्य में पद्य लेखन की एक नई विधा का मैं विमोचन करने का प्रयास कर रहा हूँ। हांलांकि इस में विमोचित करने हेतु नया कुछ भी नहीं है अपितु यह पद्य के कुछ नियमों को एक साथ पिरोकर एक नया परिवर्दि्धत रूप आपके सामने रखने का प्रयास है।

=============================================

कुण्डली परिचयः आप सभी जानते हैं कि कुण्डली मात्रिक छंद है। दो दोहों के बीच एक रौला मिलाकर कुण्डली बनती है। पहले दोहा का अंतिम चरण ही रौला का प्रथम चरण होता है तथा जिस शब्द से कुण्डली का आरम्भ होता है उसी शब्द से कुण्डली का समापन होता है।

============================================

इसे इस प्रकार भी कहा जा सकता है-

पायगौ ना लल्लू मिला कुण्डलियनु के तार,

पहले दोहा आयगौ पुनि रौला की धार।

पुनि रौला की धार आदि सौं अन्त मिलानौ,

छह पंक्तिनु में ही पूरौ मतलब समझानौ।

महारथी अन्तिम चरण दोहा कौ गायगौ,

रौला का वह प्रथम, कुण्डली मिला पायगौ।।

============================================= कविराय गिरधर जी की कुण्डली का एक उदाहरण लिया जायः

लाठी में गुण बहुत हैं, सदा राखिए संग,

गहरे नद नाले जहां, तहां बचावे अंग।

तहां बचावे अंग, झपट कुत्ता कूं मारै,

दुश्मन दावागीर होए तिन्हू को झारै।

कह गिरधर कविराय सुनो मेरे पाठी,

सब हथियारन छांडि़ हाथ में लीजै लाठी।।

=============================================

सोडली परिचयः सोडली, कुण्डली में एक दोहा और दो सोरठा के एक नये रूप का एक युग्म है। इसीलिए इसे सो (सोरठा) और (कुण्डली) डली को जोड़कर यह नाम दिया गया है। यह एक मात्रिक छंद है जिसमें मात्रा विन्यास निम्न प्रकार है-

13, 11

13, 11

11, 13

11, 13

11, 13

11, 13

सोडली में प्रथम दो पंक्तियां दोहा है। अर्थात् द्वितीय चरण और चतुर्थ चरण में गुरु के उपरान्त लघु मात्रा आती हैं साथ ही इनके काफिया का मिलान भी किया जाता है। मात्रा विन्यास 13,11; 13,11 रहता है। कुण्डली की भांति दोहा का अन्तिम चरण ही रौला का प्रथम चरण है।

सोडली की तीसरी और चतुर्थ पंक्तियां सोरठा हैं जिसमें पांचवे तथा सातवे चरण के समापन में गुरु के उपरान्त लघु मात्रा होती है तथा उनका काफिया मिलान किया जाता है। यहां यह भी ध्यान रखा जाता है कि छठवे एवं आठवे चरण का भी काफिया मिलान किया जाय लेकिन इन दोनों चरणों का समापन गुरु के उपरान्त लघु मात्रा से हो।। मात्रा विन्यास11,13; 11,13 रहता है।

सोडली की पांचवी और छठी पंक्तियां भी सोरठा हैं जिसमें नौवे तथा ग्यारहवे चरण के समापन में गुरु के उपरान्त लघु मात्रा होती है तथा उनका काफिया मिलान किया जाता है। साथ ही दसवे एवं बारहवे चरण का भी काफिया मिलान किया जाता है। आवश्यक है कि इन दोनों चरणों का समापन गुरु के उपरान्त लघु मात्रा से हो। मात्रा विन्यास 11,13; 11,13 रहता है। कुण्डली की भांति सोडली भी छह पंक्तियां अर्थात् बारह चरण युक्त काव्य है और सोडली का प्रथम शब्द या शब्द युग्म ही सोडली के अंत में आता है।

============================================= एक उदाहरण देखते हैं-

वीर भयंकर चल पड़े, हिलने लगे पहाड़,

शेर छिपे जा मांद में, ऐसी विकट दहाड़।

ऐसी विकट दहाड़, गरजना घोर भयंकर,

गरजन से दें फाड़, गिरें परवत छनछन कर।

महारथी आगाज, जंग का है ये अवसर,

होय फैसला आज, दहाड़ें वीर भयंकर।।

=============================================

सोडली क्यों? यह सत्य है कि अन्य छंदों की तुलना में कुण्डली का सृजन थोड़ा क्लिष्ट है लेकिन कुण्डली द्वारा जो प्रस्तुति कम शब्दों में पूरे प्रभाव और प्रवाह के साथ होती है वह अन्य छंदों में नहीं हो पाती है। सोडली का सृजन हालांकि कुण्डली की तुलना में और भी क्लिष्ट हो जाता है लेकिन सोडली द्वारा प्रस्तुति में कुण्डली की तुलना में प्रभावकता और प्रवाहता में और वृद्धि हो जाती है। लगातार काफिया मिलान के कारण यह और अधिक कर्णप्रिय और लयबद्ध हो जाती है।

=============================================

एक और उदाहरण देखते हैं-

बीड़ी कौ धूंआ बुरौ, खांसत हैं दिन रात,

सांस रोग ऐसैं लगैं, बिन मौसम बरसात।

बिन मौसम बरसात, कि धूंआं बहुत कसैलौ,

दिल कूं नाय सुहात, करै जिय मन कूं मैलौ।

महारथी रखि याद, सुरग की टेढी सीढी,

कर देगी बरबाद, हाथ मत लैना बीड़ी।।

=============================================

आप सभी सुधी पाठकों से उनकी प्रतिक्रिया सादर निवेदित है ताकि सोडली में अन्य आवश्यक सुधार किये जा सकें। जिससे यह जन मानस में लोकप्रिय हो सके।

=============================================

।।डा. अवधेश किशोर शर्मामहारथी।।



Tags:                                                   

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (3 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

0 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments


topic of the week



latest from jagran