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रेलवे का टी टी

Posted On: 30 Sep, 2015 Others में

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मैं और भाई साहब मथुरा स्टेशन से बाहर निकल रहे थे।

अरे वही भाई साहब, जिनका परिचय कराया था आपसे।

डा. घसीटा राम।

हाँ हाँ …. वही जो पीएच.डी. के दौरान मेरे एक साल सीनियर थे।

जी हाँ वे मेरे काल्पनिक पात्र हैं।

मैंने बताया था ना कि वे बड़े ही विनोदी किस्म के जीव हैं। बात बात में विनोद निकाल लेने में उनको महारथ हासिल है।

हाँ! तो हम दोनों आगरा से लौट कर मथुरा रेलवे स्टेशन से बाहर निकल रहे थे कि इतने में एक सरदार जी आ गये।

और भाई साहब से टिकट माँगा।

‘‘टिकट प्लीज।’’

एक डा. मन मोहन सिंह को छोड़ दें तो सरदार अपने नाम के विरुद्ध काफी असरदार हुआ करते हैं।

लेकिन मैं समझ गया कि अब इन सरदाज जी का बैण्ड बजने वाला है, सारा असर धूल में मिलने वाला है। सरदार जी ने गलत नम्बर डायल कर दिया है।

‘‘अरे भाई सरदार जी! टिकट लेना है तो बुकिंग विन्डो पर जाइये। आपको कहीं की भी टिकट मिल जायेगी।’’

सरदार जी चैंक गये-‘ ‘विन्डो वाला नहीं मुझे आपसे टिकट चाहिए।’’

‘‘क्यों? … क्या आपने हमें टिकट ब्लैक करने वाला समझ रखा है ? …. ये धंधा नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर चलता है। ऐसा सुना था। …. क्या मथुरा में भी शुरू हो गया है।’’

‘‘आप आये कहाँ से हैं?’’ सरदार जी ने पूछा।

मैं देख रहा था ….. मुझे पता था कि भाई साहब जब रौ में हों तो उन्हें रोक पाना कठिन है। …. लिहाजा मैं चुप था।

‘‘आगरा से आये हैं।’’ सीधा और सपाट जबाव दिया भाई साहब ने।

‘‘हाँ तो टिकट लाइये।’’ फिर से सरदार जी ने टिकट की मांग कर दी।

‘‘तो ऐसे बोलो ना कि आपको आगरा से मथुरा का टिकट चाहिए। … सही है ये टिकट बुकिंग विन्डो पर नहीं मिलता है।’’ वे बड़ी ही सूझबूझ के साथ बात कर रहे थे। ….

अब वे सरदार जी के नजदीक गये – ‘‘ठीक है कितनी चाहिए? …. अभी तो केवल दो ही टिकट हैं हमारे पास।’’ भाई साहब ने सरदार जी के कान में फुसफुसाया।

उन्होंने सरदार जी को गहराई से समझाया-‘‘आधी कीमत पर मिल जाऐंगी। …. इससे कम पर नहीं। …. रोज वाले हो तो मिल जाया करो। …. हम भी अक्सर आते जाते रहते हैं। …. टिकट री-साइकिल हो जायेगी तो इसमें हर्ज ही क्या है। …. हमारी यात्रा तो पूरी हो ही चुकी है। …. तुम्हारा भी फायदा और हमारा भी।”

अब सरदार जी कुछ सख्त होते दिख रहे थे – ‘‘तुमने मुझे समझ क्या रखा है?’’

भाई साहब सरदार जी से बिजनेसमैन के अंदाज में बात करने लग गये- ‘‘अरे भाई सरदार जी! सोचने और समझने की आ वश्यकता ही कहाँ है? …. लेने देने की बात करो। …. देर हो रही है लौट कर वापस भी जाना है। …. गाड़ी पहले ही एक घंटा की देरी से आयी है।”

अब सरदार जी तैश में आ गये- ‘‘मैं टी टी हूँ। टिकट दिखाते हो या बुलाऊँ जीआरपी को।’’

मैं मन ही मन सोच रहा था कि आज भाई साहब ने बुरा फंसा दिया। मामला जीआरपी तक जाने के लिए तैयार था। मैं मामले को शांत करना चाहता था, लेकिन उन्होंने मुझे बोलने से पहले ही रोक दिया।

अब भाई साहब भी सख्त हो गये- ‘‘आपको क्या हम शक्ल से बिना टिकट लगते हैं। …. हमेशा ओरीजनल टिकट ले कर यात्रा करते हैं। …. ये रही हमारी ओरीजनल टिकट। . लेकिन सरदार जी! आप भी यूनीफार्म में टिकट चैक किया करो। …. दिन अच्छा था सो बच गये, नहीं तो अभी जीआरपी को बुलाकर अन्दर करा देता। …. मैं सोच रहा था कि आज मैंने एक टिकट ब्लैकर पकड़ लिया है। …. कल के अखबार में मथुरा में टिकट ब्लैकरों की खबर छपी थी। …. लगता है पढी नहीं।’’

सरदार जी को अपनी गलती का अहसास हो गया था। ‘‘साॅरी’’- बोला और अपना कोट लेने चले गये। उन्हें और भी यात्रियों के टिकट चैक करने थे।

‘‘भाई साहब क्या खूब तरीके से बिना कहे गलती का अहसास करा दिया आपने सरदार जी को।’’ मैं उनकी तारीफ कर रहा था।

‘‘अच्छा मक्खन मत लगा। ये बता वृन्दावन जाने के लिए क्या साधन है।’’ उन्होंने मुझे हड़का लिया। “घर पर फोन करके बोल दे कि मैं भी आ रहा हूँ। बहू भोजन-पानीकी व्यवस्था कर लेगी। रात में परेशान करना ठीक नहीं है।”

मैं मन ही मन मुस्कुरा रहा था। भाई साहब कितने समझदार हैं। अब हम वृन्दावन की ओर कूच कर रहे थे। हमें वृन्दावन की बस पकड़नी थी।

(घटना, पात्र एवं स्थान आदि सभी काल्पनिक हैं, यदि कोई समानता पायी जाती है तो वह मात्र एक संयोग है। कृति का उद्देश्य किसी की भावना को ठेस पहुंचाना नहीं है।)

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
October 1, 2015

श्री महारथी जी बहुत अच्छा व्यंग |व्यंग के साथ व्यवस्था में सुधार की बात

Maharathi के द्वारा
October 28, 2015

उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद।


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