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तम्बाकू विरोध

Posted On: 20 Jul, 2017 कविता में

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Smoking

पान खायकर मारते, रुधिर रंग की पीक,
श्वेताम्बर क्रूरता बनी, लाल रंग की लीक।
लाल रंग की लीक. दांत, मुंह, होठ लाल हैं,
साथ तमाखू हीक. झेलते तुम कमाल हैं,
महारथी समझाय. लड़े तब आय आयकर.
फटे गलफटे हाय. सुपारी पान खायकर।
गुटखा नहीं चबाइये, दांतों में घुस जाय,
धीरे-धीरे दाढ़ को, जड़ से देय हिलाय।
जड़ से देय हिलाय, होय तब पीड़ा भारी,
फिर पीछे पछताय, जाय जब दाढ़ उखारी।
महारथी ले मान कि गुटखा कबहू मत खा,
अनुभव मेरा जान, बड़ा दुखदायी गुटखा।
बीड़ी कौ धुआं बुरौ, खांसत हैं दिन रात,
सांस रोग ऐसैं लगैं, बिन मौसम बरसात।
बिन मौसम बरसात कि धुआं बहुत कसैलौ,
दिल कूं नाय सुहात, करै जिय मन कूं मैलौ।
महारथी रखि याद, सुरग की टेढ़ी सीढ़ी,
कर देगी बरबाद, हाथ मत लैना बीड़ी।
नौसिखिया पीवे लगे शौक-शौक सिगरेट,
सिगरेटी सी टांग के पिचके-पिचके पेट।
पिचके-पिचके पेट, मारते पैर कुल्हाड़ी,
सेहत लेय समेट, समस्या फंस गयी आड़ी।
महारथी कहि राम, बचे सेहत अरु रुपिया,
सिगरेटनु के नाम, भूलिजा ओ नौसिखिया।
हाय तमाखू का असर गई नयन की जोत,
चूना फाड़े गाल को मुंह में छाले होत।
मुंह में छाले होत, गरम भोजन दुखदायी,
मन ही मन में रोत, दाल मिर्ची की आयी।
महारथी दे थूक-थूक के लती सुलाखू,
यही बात दो टूक, छोड़ दे हाय तमाखू।
खैनी को तू खा रहा, खैनी खावे तोय,
खैनी से क्या फायदा, एक गिना दे मोय।
एक गिना दे मोय कि तन मन धन की हानी,
सड़ी खाद ये होय, बात ये तुझे बतानी।
महारथी गल जाय, कील लोहे की पैनी,
मत एसिड को खाय, थूक दे मुंह से खैनी।



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